
700 बच्चों का स्कूल, व्यवस्था के नाम पर सिर्फ एक भृत्य और एक स्वीपर!
चार साल से अंग्रेजी माध्यम चल रहा, लेकिन अतिरिक्त कर्मचारी नहीं; खुले टिन शेड में पक रहा मध्यान्ह भोजन, शिक्षक खुद बजा रहे घंटी

भर्रीडांड/मरवाही। सरकार ने सरकारी स्कूलों को बेहतर सुविधाओं से लैस करने और शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के बड़े-बड़े दावे किए हैं, लेकिन गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले के मरवाही विकासखंड स्थित स्वामी आत्मानंद हिंदी/अंग्रेजी माध्यम शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय भर्रीडांड की तस्वीर इन दावों पर गंभीर सवाल खड़े करती नजर आ रही है।
1963 में स्थापित इस विद्यालय में करीब 700 छात्र-छात्राएं और लगभग 39 शिक्षकों का स्टाफ है, लेकिन पूरे स्कूल की गैर-शैक्षणिक व्यवस्थाओं का जिम्मा महज एक भृत्य और एक स्वीपर के भरोसे है। अंग्रेजी माध्यम शुरू हुए चार साल से अधिक समय बीत चुका है, बावजूद इसके अतिरिक्त भृत्य तक की व्यवस्था नहीं हो सकी है।

सरकारी स्कूल में घंटी बजाने वाला भी नहीं!
व्यवस्था की स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पीरियड बदलने के लिए शिक्षकों को खुद घंटी बजानी पड़ रही है। सवाल यह है कि जब शिक्षक पढ़ाने के बजाय स्कूल की बुनियादी व्यवस्थाओं में ही उलझे रहेंगे तो बच्चों की पढ़ाई और शिक्षा की गुणवत्ता पर कितना असर पड़ेगा?

ग्रामीण प्रताप रजक, पदम चंद राय, राजेश केंवट और सुनील सिरवास का कहना है कि अंग्रेजी माध्यम शुरू हुए चार साल से ज्यादा हो चुके हैं, लेकिन शासन की ओर से अब तक एक भी अतिरिक्त भृत्य नहीं दिया गया। ग्रामीणों ने इसे शिक्षा व्यवस्था की अनदेखी बताया है।
खुले टिन शेड में बन रहा बच्चों का भोजन!
सिर्फ कर्मचारी ही नहीं, बल्कि मध्यान्ह भोजन की व्यवस्था भी सवालों के घेरे में है। स्कूल में बच्चों के लिए भोजन खुले टिन शेड के नीचे चूल्हे पर तैयार किया जा रहा है।स्वसहायता समूह की अध्यक्ष किरण यादव ने बताया कि पंचायत के माध्यम से इसी सत्र में ओपन शेड बनाया गया है और फिलहाल उसी के नीचे खाना बनाना पड़ रहा है।
वहीं सरपंच सुमन सिंह का कहना है कि किचन शेड निर्माण के लिए प्रस्ताव जनपद पंचायत को भेजा गया है, लेकिन बजट उपलब्ध नहीं होने की बात कही जा रही है।कर्मचारी रिटायर होते गए, व्यवस्था चलती रही भगवान भरोसे!
पूर्व व्याख्याता प्रकाश चंद राय और जनपद सदस्य सिम्मी दिलीप साहू ने कर्मचारियों की कमी पर सवाल उठाते हुए कहा कि कर्मचारी लगातार सेवानिवृत्त होते जा रहे हैं, लेकिन उनके स्थान पर नई भर्ती नहीं हो रही है। उनका कहना है कि यह स्थिति शासन की उदासीनता को दर्शाती है।
यहां बड़ा सवाल यह भी है कि जब स्कूल में सैकड़ों बच्चे पढ़ रहे हैं और दो माध्यम संचालित हो रहे हैं, तो गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों की व्यवस्था को लेकर शिक्षा विभाग अब तक गंभीर क्यों नहीं हुआ?
प्राचार्य ने कहा—अधिकारियों को बता चुके, डीईओ बोले—प्रिंसिपल से बात करिए
विद्यालय की प्राचार्य कालिका सिंह ठाकुर ने कहा कि स्कूल की कमियों और कर्मचारियों की कमी के संबंध में उच्च अधिकारियों को अवगत करा दिया गया है, लेकिन अभी तक कोई समाधान नहीं हुआ है।
वहीं जिला शिक्षा अधिकारी रजनीश तिवारी से जब इस मामले में प्रतिक्रिया ली गई तो उन्होंने कहा—“प्रिंसिपल से बात कर लीजिए।”
डीईओ के इस जवाब के बाद सवाल और गंभीर हो जाता है कि आखिर जिम्मेदारी किसकी है? यदि विद्यालय की समस्याओं की जानकारी उच्च अधिकारियों को दी जा चुकी है और वर्षों बाद भी समाधान नहीं हुआ, तो क्या शिक्षा विभाग किसी बड़ी कार्रवाई या व्यवस्था सुधार का इंतजार कर रहा है?
एक तरफ सरकार बेहतर शिक्षा, आधुनिक स्कूल और सुविधाओं की बात करती है, दूसरी तरफ जमीनी हकीकत यह है कि सैकड़ों बच्चों वाले स्कूल में घंटी बजाने तक के लिए कर्मचारी नहीं है और बच्चों का भोजन खुले टिन शेड के नीचे बनाया जा रहा है। भर्रीडांड के इस स्कूल की तस्वीर शिक्षा विभाग के दावों और जमीनी व्यवस्था के बीच के अंतर को उजागर करती है।















